हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए – दुष्यंत कुमार


हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए!

आज यह दीवार, पर्दों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी की यह बुनियाद हिलनी चाहिए!

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए!

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए!

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन जलनी चाहिए!

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तूफ़ानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार – शिव मंगल सिंघ सुमन


तूफ़ानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

आज सिंधु ने विष उगला है
लहरों का यौवन मचला है
आज हृदय में और सिंधु में
साथ उठा है ज्वार

तूफ़ानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

लहरों के स्वर में कुछ बोलो
इस अंधड़ में साहस तोलो
कभी कभी मिलता जीवन में
तूफ़ानों का प्यार

तूफ़ानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

यह असीम निज सीमा जाने
सागर भी तो यह पहचाने
मिट्टी के पुतले मानव ने
कभी ना मानी हार

तूफ़ानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

सागर की अपनी क्षमता है
पर मांझी भी कब थकता है
जब तक साँसों में स्पंदन है
उसका हाथ नही रुकता है
इसके ही बल पर कर डाले
सातों सागर पार

तूफ़ानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

Chick Flick


Watched a pure chick flick (Aisha) with 4 guys! It totally spoiled all the fun I could have had.

Lesson 1 : Never watch a chick flick in a theatre

Lesson 2: Never watch it with guys

Other than that, Sonam Kapoor is hawt and Abhay Deol is sooo seriously wanted.

हम पन्छि उन्मुक्त गगन के – शिव मंगल सिंघ सुमन


हम पन्छि उन्मुक्त गगन के
पिंजर्बद्ध न गा पाएँगे ,
कनक तीलियों से टकरा कर
पुलकित पंख टूट जाएँगे!

हम बहता जल पीने वाले
मर जाएँगे भूखे प्यासे ,
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक कटोरी की मैदा से!

स्वर्ण क्षृंखला के बंधन में
अपनी गति उड़ान सब भूले ,
बस सपनों में देख रहे हैं
तरु की फुन्गि पर के झूले!

ऐसे थे अरमान की उड़ते
नील गगन की सीमा पाने ,
लाल किरण सी चोंच खोल
चुगते तारक अनार के दाने!

होती सीमा हीन क्षितिज से
इन पंखों की होडा होडी ,
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों के डोरी !

नीड ना दो चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न भिन्न कर डालो ,
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न ना डालो!

One of the best poems ever!!

Quillpad rocks!!!


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बस एक ही बात कहनी है – अति उत्तम!!

उलझन


उलझन सी है एक

सब कुछ घूम रहा है

कुंठित उमंग सीमित उत्साह

पल पल चूर हो रहा है

इतना कठिन कैसे हो गया?

स्वप्न में तो ना था

जैसे छू नही पा रही परत के पीछे की दुनिया

छलावा तो ना था?

जब अपने पैर पर खड़ी होने की सोची थी

याद है मन कैसे प्रफुल्लित था

ये करूँगी वो करूँगी

याद नही किस किस को कहा था

अरे दुनिया ऐसे नही चलती

मैं चला के दिखाऊँगी

आज तक किसी ने न किया होगा

वो कर जाऊंगी

क्या जोश क्या जुनून

सब कुछ अद्भुत था

कुछ साल हुए

मन अनमना सा है

कहीं लगता ही नही

अजीब सी बेचैनी है

ऐसा लगता है जैसे सब फालतू है

कुछ नही करना मुझे

कहीं नहीं जाना मुझे

अकेला छोड़ दो मुझे

क्यूँ वो करूँ जो दूसरे चाहते हैं

मेरा भला? मेरा बुरा मत समझाओ

मुझे जूझने दो!

किससे? पता नहीं

पर मुझे अकेला छोड़ दो, बिल्कुल अकेला

अरे ये देखो, ये तो वहाँ हैं जहाँ मैं नहीं

वहाँ हैं जहाँ मुझे जाना था

अरे वो सुनो, फलाँ ने ऐसा किया

अच्छा ? अच्छा किया कभी मैं भी सोचती थी

मैं यहाँ वो वहाँ सब कहाँ कहाँ

मैं गुमशुदा!

कहाँ चली गयी थी?

एक अंधेरी गली थी

कुछ दीखता ना था , सुनाई ना देता था

चारों ओर सन्नाटा और अंधेरा था

मनहूसियत घूमती थी वहाँ

उस गली से निकली

तो निराशा की बस्ती में जा पहुँची

चारों तरफ बीमार से अरमान घूम रहे थे

हार की गंध फैली थी

सबके चेहरों पर प्रश्नचिन्ह के निशान

हौसले अपंग से बैठे थे

मैं बस वहीं फँस गयी थी

एक अंधेरी गली में

कुछ दीखता ना था, कुछ सुनाई नही देता था

अब कैसी हो?

भली हूँ! वो गली पीछे छूट गयी है

साथ में छूट गया आत्मविश्वास

रोशनी के अभ्यस्त होंने में वक़्त लगेगा

कठिन है

पर होके रहेगा!